Monday, November 22, 2010

डॉ. सुनीता कृष्णन की कोशिश और - जिन्दगी टुकड़े टुकड़े

हाल ही में TED की conference सुनी और जाना छोटी छोटी बच्चियों और लड़कियों का हाल इस देश में क्या हें ? हर स्थिति के आगे एक सवालिया निशान और फिर आगे कोई भी जवाब नहीं बस यही जिन्दगी हें बहुत सी बच्चियों और लड़कियों और औरतों की इस देश में |

एक नाम जो बड़े गर्व से ऊपर उठा इस conference में वो था डॉ. सुनीता कृष्णन | यही वो नाम हें जो हजारों लड़कियों का जीने का सहारा बन गया | 3 Idiots का dialog "एक दिन तुम पछताओगे की गाडी दरवाजे पर खडी थी और चिट्ठी हाथ में थी बस जरा सी हिम्मत की होती तो जिन्दगी कुछ और ही होती " शायद ऐसी ही इन्सान की असली जन्दगी से लिया गया था |  अगर डॉ. सुनीता में वो हिम्मत नहीं होती तो वो नहीं होता जो करके आज कई लड़कियों के लिए एक भगवान से बढकर हें और हमारे लिए एक प्रेरणा से बढ़कर |
 
अकेली डॉ. सुनीता  कृष्णन ने TED के जरिये 3200 से ज्यादा बच्चियों और लड़कियों को बचाया जिनका बलात्कार हुआ और शोषण किया गया था | कई बच्चियों का तो ना जाने कितने लोगो ने शोषण किया और बेबस Railway tracks और सड़कों पर छोड़ दिया | इनमे में ऐसी बच्चिया भी हें  जो केवल 3-4 साल की थी जब उनको बचाया गया था | ऐसे लोगों के बारे सोचके भी घिन्न आ जाती हें क़ि हमारे देश में ऐसे लोग भी हें | बच्चों की जिस उम्र में हम भगवान देखते हें उनपर ऐसा वहशीपन ना जाने कहाँ से लोगों में आ गया क़ि कच्ची उम्र की बच्चियों की जिन्दगी के साथ खिलवाड़ करने में भी नहीं चुकते ?

खुद डॉ. सुनीता कृष्णन के साथ 8 लोगों ने बलात्कार किया था | वो दो साल तक खुद इस हादसे से उभर नहीं पाई मगर उन्होंने सोच लिया था क़ि उन बच्चियों और लड़कियों की जिन्दगी बचानी हें जो इस तरह के हादसे का शिकार हो जाती हें या उनको तेयार करना ताकि वो ऐसे हादसों का शिकार ना हो | आज वो उन लोगों की प्रेरणा हें जो इस देश से ऐसी गंदगी साफ करने में लगे हुए हें | आज से 25 साल पहले अगर उन्होंने ये हिम्मत नहीं की होती तो ना जाने कितनी लडकियों की जिन्दगी बर्बाद हो जाती |
अगर हिसाब लगाया जाये तो हर साल उन्होंने  128 और हर तीसरे दिन एक लडकी क़ि जिन्दगी बचायी हें | आज उनको सभी सम्मान के साथ देखते हें मगर एक वक़्त था जब लोग उन्हें एक घ्रणित नज़र से देखते थे | उनकी हिम्मत का जवाब नहीं |

दूसरी तरफ आज जो सबसे बड़ी समस्या हें वो ये क़ि जब भी कोई ऐसी स्थिति में होतें हें वो अपनी आवाज़ को दबा देते हें क्यूंकि हमारा समाज ऐसे लोगों का जीने दुश्वार कर देता हें जो इन हादसों का शिकार हो जाता हें | बहुत कम लोग हें जो किसी ऐसी स्थिति में अपनी आवाज़ उठा के दुनियाके सामने खड़े होने की हिम्मत रखते हें

हमारे देश में शिकार खुद गुनाहगार बन जाता हें | यही वजह हें क़ि बहुत कम लोगो को हमारे देश में सजा मिल पाती हें | सच ही  हें बलात्कार करने वाले को मौत से बड़ी कोई सजा हो तो वही मिलनी चाहिए |
पिछले 25 सालों में डॉ. कृष्णन ने जिन्दगी को बहुत बारीकी से देखा, बचाया और उन बेबस लड़कियों को फिर से बेहतर जिन्दगी देने में जी जान लगा दी | बहुत कम लोग हें ऐसे इस देश में जो अपना दर्द भूल कर लोगो की जिन्दगी बदलना चाहते हें |

ऐसे लोगों की जिन्दगी बस ऐसे चलती हें -

मंजिलें दूर हें मगर अभी चलते रहना हें थकना नहीं, दिल में दर्द में मगर इस जूनून को अभी थमना नहीं |
चलो छोड़ के दुनिया और हम उनका हाथ पकडे, समेटनी हें जिनको ये बिखरी हुई जिन्दगी टुकड़े टुकड़े ||

उनको सुनकर दिल से एक ही आवाज़ आती हें  सलाम डॉ. सुनीता कृष्णन, We are proud of you. You are the real Indian woman. Many many thanks to TED who supports Dr. Sunitha.

Saturday, November 20, 2010

Guzaarish - ek nazar

 Hritik played the lead role of  Ethan Mascarenhas and wand to end his life as he has become paralyzed and has no will for the life. The movie moves in slow motion and makes aware of the pain the people with paralysis. The best part is the emotional part has been high as earlier movies from Sanjay Leela Bhansali. At many points in the movie you would have those high emotional points and your eyes may start becoming wet.

The movie is based on the issue of RIGHT TO DIE on someone's own will. As we know this is against the constitution of India and the same debate has been filmed in this movie. The movies raises many such issues where the RIGHT TO DIE seems to be more significant than the constitution of India. The movie is smoothly looped in the love between Ethan and Sofia(Aishwarya Rai) and the fight for thr right is taken to every heights. Sanjay Leela Bhansali has once again come up with this emotional flick. Though the execution of the topic into a nice movie has not been that successful but again it is a watchable movie.

Monday, November 15, 2010

दुनिया एक टीवी सी लगती हें--

वक़्त रुकता नहीं और लोग बदल जाते हें ऐसा सभी कहते हें मगर ये देश ऐसा हें जहा सदियों से हम नहीं बदले हें | हमे नहीं पता किस दिशा में हम जा रहे हें ? लेकिन एक बात तो साफ हें सालों बाद जब हम पलट के देखेंगे तो लगेगा की एक छोटा सा कदम बहुत सी जिंदगियां बदल सकता था | एक छोटी सी बात जिसकी वजह से दुनिया की सोच बदल सकती थी |

 आजकल ये दुनिया ही एक टीवी सी लगती हें जहा बहुत कुछ हो रहा हें मगर हमें कुछ फर्क ही नहीं पड़ता बस हम देखते रहते हें बिना सोचे समझे|  जब कोई हमारे बगल से निकलता हें तो ऐसा लगता हमें कुछ मतलब ही नहीं होता हम ऐसे ही थे या अब हो गए पता नहीं.  ना  जाने किस दुनिया में हम खोये रहते हें  कभी सोचता हूँ एक वक़्त था जब लोग पडोसी हुआ करते थे, आज पड़ोस मैं अजनबी रहा करते है. जिनकी आँखों में ख़ुशी देख कर ख़ुशी होती थी वही आज जलन होने लगती हें.  जहाँ दुआ में रब हुआ करता था अब उस में सब हुआ करता हें गुस्सा भी, नफ़रत भी,  धोखा भी, स्वार्थ भी  मांगना तो खेर होता ही हें | जहाँ थोडा सा वक़्त अपनों के लिए हुआ करता था, आज वो टीवी रेडियो में निकल जाता हें. अब में क्या कह रहा हूँ इसके बारे में एक बात कहूँ- एक कहावत हे english मैं जो कहती हे -

“I am so clever that sometimes I don't understand a single word of what I am saying.”

सच ही हैं कभी कभी हम क्या कह रहे हें हमें पता ही नहीं होता|

मेने के गाँव की वो जिन्दगी भी देखी हें जहा दिनभर में सिर्फ एक बस कसबे की तरफ जाती थी और शाम को वही बस लोट के आती थी और मेट्रो की व्यस्त जिन्दगी भी,  जहा एक मिनट में 286 कारें हमारे पास से गुजर जाती हें दोंनो जिन्दगी में फर्क कुछ भी नहीं रहा ना उस गाँव में कभी सुकून मिला ना उस शहर में कभी सुख मिला | गाँव में एक सवारी के लिए बस 30 मिनट ऐसे ही रुक जाती थी और शहर में सामने खड़े हो जाओ तब भी कोई नहीं रुकेगा | ये सब में कहा रहा हूँ तो इसलिए क़ि कोई हें जो इन सब से गुजर के आज इस मुकाम पर हें जहा सब उनका सम्मान करते हें |

बात कर रहा हु श्री मनमोहन सिंह की जो हमारे प्रधानमंत्री हें एक खामोश सा इन्सान जो अपने अन्दर ना जाने कितनी सोच विचार और बाते ले के इस देश को चला रहा हें| दुनिया लाख कहे वो कटपुतली प्रधानमंत्री हें मगर ना कभी उन्होंने विरोध किया ना किसी को कोई जवाब दिया | कहीं अन्दर उनके एक जज्बात हें जो उनको प्रेरित करता हें क़ि भारत का आने वाला कल एक बेहतर कल हो | ये उनकी बातो से और उनके फैसलों से साफ पता चलता हें | US president Obama यूँही उनकी तारीफ़ नहीं करते क़ि वो उनको गुरु मानते हें वो इसलिए क़ि recession के दौरान भी ये देश डगमगाया नहीं तो कहीं ना कहीं इसमें हमारे प्रधानमंत्री की उस खामोश सी आँखों और हलकी सी मुस्कान में इसका जवाब छिपा हें | बस काम करना यही उनका शौक हें और बेहतर काम से ही उनको ये जगह मिली हें |
 एक नजर जरा उनके अब तक क़ि पोस्ट पर डालो-



सीधा सा एक इन्सान जो आज दुनिया को नया रास्ता दिखा रहा हें, कुछ लोग सच में बहुत ही अलग होते हें Be proud that he is our prime minister. जाने कौनसी ताकत हें जो सालों से उनको मुस्कुरा के सबसे मिलने की खूबी देती हें खामोश रह के सब कहने की ये कला सबको कहाँ आती हें
मुझे भी नहीं आती......


Chandresh -not as always, में भी खामोश सब देख रहा हूँ !

Friday, November 12, 2010

लिखा जो मेने

फलक के तारे तेरी आँखों में टिम टिम |
सावन के बादल तेरी बाँहों में रिम झिम ||
 दिन का उजाला तेरी गोद में छाया सा,
रात का अँधेरा भी तेरे संग रौशनी मद्धम ||

क्यों तुझे खुदा से बढ़कर माना हमने |
तुझपर सबसे ज्यादा हक़ माना हमने ||
रहे कोई तेरे मेरे दरमियाँ केसे मुमकिन हें |
तू हें अन्दर मेरे ये आज जाना हमने ||

अब जो ये मेरी जिन्दगी अलग हें |
मेरी खुद से जो ये दोस्ती अलग हें ||
रहे तेरी याद के गुलाब मेरी किताब में ऐसे |
तेरी खुश्बुओ में आज मेरी हस्ती अलग हें ||
क्या कहे की क्यों अब ये जिन्दगी अलग हें |||

Chandresh - थोड़ी सी कलम थोड़ी सी स्याही, मंजिलें मुश्किल मगर में हूँ राही |
                  मुझे रुकना नहीं किसी एक जगह, उसने की हें कहीं थमने से मनाही ||